नीला रंग था उसका , शोर भी जिसका हिस्सा था ,
वो समंदर सामने था मेरे , सुन रहा मेरा किस्सा था ।
मैंने कहा , "पढ़ ले मुझे , मैं तेरी कहानी हुँ ",
किनारे ज़मीं पे जो बह रही , तेरा नमकीन पानी हुँ ।
मिट गया जो , छप रहा , सिने पे तेरे दरबदर ,
वो बहता पानी , संग मेरे , चल कर रहा था सफर ।
उसकी उफ़ान मुझको मेरी औकात याद दिला गई ,
जो रहता था अंदर मेरे , मुझे उस तूफ़ान से मिला गई ।
मिठास संगीत की होती है क्या , उसका पता चला मुझे ,
उस सिरफ़िरे ने जो पिलाया , उससे भी प्यास क्यों बुझे ?
वो सूरज खड़ा इंतज़ार में , बाँहे थीं जिसकी खुली ,
मिट गया उसके लिए , डूबी रौशनी , उसमे घुली ।
बदला समां , वो रहा , रही उसकी फितरत वहीं ,
मैं खड़ी तकती रही , उसकी शराफत न बदली ।
एक टुकडा रेत का भी , ख़ामोश उसकी सुनता था ,
शायद कहीं वो समंदर , सबकी दास्ताने बुनता था ।
मिल गया एक पल में जो , इक नया सपना था ,
उन लहरों में जो दिख गया , वो कोई मेरा अपना था ।
कह अलविदा उसे , मैं मुड़ी एक दुसरी गली ,
तिनका चिराग़ का जला , क्या हुआ जो शाम ढली ।

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