शनिवार, 6 जून 2015

समंदर


नीला रंग था उसका , शोर भी जिसका हिस्सा था ,
वो समंदर सामने था मेरे , सुन रहा मेरा किस्सा था ।

मैंने कहा  , "पढ़ ले मुझे , मैं तेरी कहानी हुँ ",
किनारे ज़मीं पे जो बह रही , तेरा नमकीन पानी हुँ ।

मिट गया जो , छप रहा , सिने पे तेरे दरबदर ,
वो बहता पानी , संग मेरे , चल कर रहा था सफर ।

उसकी उफ़ान मुझको मेरी औकात याद दिला गई   ,
जो रहता था अंदर मेरे , मुझे उस तूफ़ान से मिला गई ।

मिठास संगीत की होती है क्या , उसका पता चला मुझे ,
उस सिरफ़िरे ने जो पिलाया , उससे भी प्यास क्यों बुझे ?

वो सूरज खड़ा इंतज़ार में , बाँहे थीं जिसकी खुली  ,
मिट गया उसके लिए , डूबी रौशनी , उसमे घुली ।

बदला समां , वो  रहा , रही उसकी फितरत वहीं ,
मैं खड़ी तकती रही , उसकी शराफत न बदली ।

एक टुकडा रेत का भी , ख़ामोश उसकी सुनता था ,
शायद कहीं  वो समंदर , सबकी दास्ताने बुनता था ।

मिल गया एक पल में जो , इक नया सपना था ,
उन लहरों में जो दिख गया , वो कोई मेरा अपना था ।

कह  अलविदा उसे , मैं मुड़ी एक दुसरी गली ,
तिनका चिराग़ का जला , क्या हुआ जो शाम ढली ।



                   --- स्नेहिऌ (27 March 2015 -Mangalore)

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