बुधवार, 12 जुलाई 2017

मेरे बेटे !

जो देख  पाता अपना प्रतिबिंब तेरे आईने  में , मेरे बेटे ,
भ्रम के जाल से खींच लाता तुझे , तेरे सपनो को समेटे।

मैं पिता बन कर रह गया , काश तेरा दोस्त बन पाता ,
हुई गलती मुझसे , काश तुझे अपना सत्य बता पता।

मैं भी तड़पता था उस परिंदे की तरह , जिसकी उड़ान भरने को तु क़ाबिल था ,
मेरे भी मन मस्तिष्क में , तेरी ऊचाईयों का पैमाना मुझे हासिल था।

तेरी खुशियाँ ही मेरी ज़िन्दगी , मेरे अस्तित्वा कि जननी थी ,
तेरी सपनो की  अंजलि से मुझे मेरी आकांक्षाओं की पोखर भरनी थी।

मैं खड़ा पाता हूँ ख़ुद को निरंतर उसी छण के दो राहो पर ,
जहाँ अनायास ही मुझे तु छोड़ गया निरुत्तर , एक प्रश्न कि सीमाओं पर।

हूँ असमर्थ , अब ढूंढता हूँ तुझे प्रतिदिन उन्हीं छणो में ,
जीता हूँ तुझे , तेरी पहचान को अपनी भंगिमाओं के कणों में।

मैं निर्लिप्त अपनी व्यथा में , तेरी प्रतीक्षा करता रहूँगा ,
अपने हृदय की तान पे , तेरी अधूरी साँसे भरता रहूँगा।

                                                                   
                                                                                                                            - स्नेहिल


ये काफ़ी कितना होता है ?

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