सोमवार, 25 मई 2020

मेरे दिल~

जब भी झाँका ख़ुद के अंदर,
मेरा सच मुझसे कहता है,
तू कोशिशे लाख कर ले मेरे दिल ,
तेरे अंदर एक नासमझ ,नादान कोई रहता है |

हर किताबी सच पढ़ चूका वो,
कहानियाँ भी उसको मालूम थी कई सारी,
समझने लगा था खुद को घना पेड़ ,
पर रह गया बेचारा फूलों कि क्यारी |

कहता कैसे अपने सच को वो बेज़ुबान ,
मुठ्ठी में बंद किए उसको वो तड़पता रहा ,
पर न छुपा सका उससे हक़ीक़त अपनी ,
उस दिल का दिल था वो जो अंदर उसके धड़कता रहा|

पानी सा था रंग-रूप उसका भी ,
गहराईयाँ भी था - उसकी बेज़ुबान आँखों में ,
शायद वो दिल समझ जायेगा उस दिल को ,
जो था वक़्त बिताया मोहब्बत कि सलाखों में  |

साथ सांसे जो लेने लगे थे दोनों ,
उस दिल को अपने दिल की हरकतों का पता था ,
हाथ थामे चलें दोनों जब एक मंज़िल को पाने ,
रास्तों पे पसरा कोहरा कदम - कदम छटा था |

अनसुनी आवाज़ उसकी पहचान लेगा वो ,
कांपते होंठो से एक ज़िक्र भर काफी रहा ,
उस दिल की ख्वाहिशे भी बड़ी बचकानी रही ,
अपने दिल की अनकही फ़िक्र उसको नमाफी रहा |

आंखे मूंदे जब याद करते थे एकदूसरे को ,
मन के आईने में जो अक्स नज़र आते थे ,
उस दिल के अंदर का दिल ही तो है वो ,
ख़ुदी को खुदा से वो दिल अलग नहीं पाते थे |


                                                                                      
                                                                                                     

                                                                                                                                    -स्नेहिल

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