बुधवार, 29 अप्रैल 2020

बोली धरती !

मैं धरती नवजीवित रहती - पर तेरा मोह सृजन का छूटा ना,
मिथ्या रुपी जाल था पसरा , अहंकारी दर्पण टूटा ना |

अनभिज्ञ रही अवसाद से अपने , मैं जीती सिसक सिसक ,
कुंठित रही संतान से अपने , मैं रोती बिलख बिलख |

निर्भर नहीं मैं किसी पर , तू पला जहा - वो तेरी जननी है ,
धिक्कारता स्वयं को , जो है काल पसरा , तेरी करनी है |

है विष्तृत वृक्ष वहीं , फैलाये आंचल , आसमान की छाँव में ,
जिसने बदला सम्पूर्ण जगत को , रुका अश्तित्व के पड़ाव में |

कलकल बहती नदियाँ आज भी सुरीले सरगम सुनाती है ,
बैरी बैठे सुनसान किनारे , गुनगुनाते अधीर कर्णो को  बुलाती है| 

कर्म चक्र की बेड़ी बांधे धर्मग्रंथों का तू अनुयायी ठहरा ,
क्यों सहम गया  परिणाम को देखे , ये और कुछ नहीं - बस तेरा चेहरा |

है बदल चूका युग , बदला मौसम , बदला विश्व मुखमण्डल है ,
मनुष्य भयावह रूप दिखाता , अब खुद से करता दंगल है |

क्यों सिमट गए सब घरों के अंदर , है खड़ा बुलंद आकाश वहीं ,
कैसा पोरस , कौन सिकंदर , जा कर नए घर की तलाश कहीं |

चट्टानों सा धैर्य लिए मेरे कपाल पर एक सत्य लिखा था ,
"तू शरणागत है इस प्रकृति का" क्या तेरे बंद चक्छुयो को दिखा था?

बोली धरती ! संताप की गगरी से निकला विष तो तुझे पीना पड़ेगा ,
समय रुपी झरने से जब तक न निकले अमृत तुझे जीना पड़ेगा |


                                                                                
                
                                                                                  - स्नेहिल

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