क्यों कल की फिकर सताए है, जो आज कहा सब पाए है।
क्यों मोह का बंधन टूटा है , सब ओर जो पसरा झूठा है।
क्यों सांझ पंछी घर को जाए है, किरणे जो राह दिखाए है।
क्यों तू मुस्काता हर पीड़ में भी, जो पीर को पाता हर भीड़ में भी।
क्यों दुख़ के बादल गरज रहे, जो बाद में पुष्पित बरस रहे।
क्यों पोधा बाहर आकर भी, सब समझ गया ना चाह कर भी।
क्यों नदियां कल कल बहती है,जो दरिया में जाकर मिलती है।
क्यों शोर मचाता दौड़ रहा , वो मौन सन्नाटा बोल रहा।
क्यों हमसे हाथ मिलाए है, जो गैरो की बारात में आए है।
क्यों सदियां सौगातें लायी है , जो हमसे मिलने आयी है।
क्यों होता मन्न में हौसला , जब बात अपनों की आती है।
क्यों कांटो पे भी सो लेते है, जब बात सपनों की आती है।
क्यों मोह का बंधन टूटा है , सब ओर जो पसरा झूठा है।
क्यों सांझ पंछी घर को जाए है, किरणे जो राह दिखाए है।
क्यों तू मुस्काता हर पीड़ में भी, जो पीर को पाता हर भीड़ में भी।
क्यों दुख़ के बादल गरज रहे, जो बाद में पुष्पित बरस रहे।
क्यों पोधा बाहर आकर भी, सब समझ गया ना चाह कर भी।
क्यों नदियां कल कल बहती है,जो दरिया में जाकर मिलती है।
क्यों शोर मचाता दौड़ रहा , वो मौन सन्नाटा बोल रहा।
क्यों हमसे हाथ मिलाए है, जो गैरो की बारात में आए है।
क्यों सदियां सौगातें लायी है , जो हमसे मिलने आयी है।
क्यों होता मन्न में हौसला , जब बात अपनों की आती है।
क्यों कांटो पे भी सो लेते है, जब बात सपनों की आती है।
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