रविवार, 17 अक्टूबर 2021

मैं..



मैं को जानू मैं कैसे ,
मिले कई मुझे मुझ जैसे | 
मन की मेरी मान लू मैं तो ,
जान लू खुद को मैं वैसे | 

है कौन नया हुआ कौन पुराना ,
असली नकली का भेद बताना | 
मारे ताली गाये गाना 
हँसता  खुद पे अंधा  जमाना | 

मन यहाँ अभी कल कहाँ किधर है ,
समय कि बड़ी कसी कमर है | 
दौड़ समय के साथ हांफती ,
उम्मीद अधूरी अजर अमर है | 

लो समझ गया सब खेल निराले ,
चमक दमक पर मन के काले | 
रहस्य यही बस सच बोल दे तू जो ,
दिल सोना और सब दिलवाले | 

पलट कर पन्ना नई कहानी से जब तू कुछ लिख जायेगा ,
मुड़ कर बचपन ऊंगली थामे साथ तेरे फिर आएगा | 
देख कर मेरे मन की काया आईना भी मुस्कायेगा ,
पढ़कर अपनी नयी कहानी तू खुद को जान जायेगा | 



ये काफ़ी कितना होता है ?

क्या बारिश की बूंदे काफी हैं गागर को भरने के लिए ? क्या तिनके का सहारा काफी है सागर को तरने के लिए ? ये काफी कितना होता है! मन कचोट हृदय रोत...