है सहमी सी नज़र , असर उसकी उतनी नहीं ,
थामे चली दामन कही , फिकर उसको उतनी नहीं ,
समेटा था , समेटेगी जिंदगी के फूलों को सदा ,
वो श्रोत है जीवन का , क्या है इन् काफिलों को पता ?
समंदर राज़ जिसका जानता है अपने सीने मैं छिपा ,
पर्वतों की चौखटों पर जिसका माथा ना झुका ,
है तितलियाँ इठला रही , संग जिसके गा रही ,
वो शक्ति है वो सय्यम है ,क्या है इन् काफिलों को पता ?
है रूह जिसकी मखमली ,वो चाँदनी सी रौशनी ,
कह रही इक दास्ताँ तेरी -मेरी सुनी-सुनी ,
वो अमृत की बूँद जो दर्द देती है घटा ,
वो ममता है वो मोह है ,क्या है इन् काफिलों को पता ?
है घुरती नज़र जिसे , वो चीखती , वो भागती ,
वो कम नहीं ,कमज़ोर नहीं ,है सच की ओर झाँकती ,
आइना दिखाए जो ,पौरुष को देती है धता ,
वो आदि है ,वो नारी है , क्या है इन् काफिलों को पता ?
स्नेहिऌ

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