मेरा चलना कभी मंज़िल की ओर था ही नहीं ,
लपेटु मैं शोहरत की चादर वो चाहा ही नहीं ,
कसमकस की उस कसक का क्या कहना !
जो दिल में ख़ामोश रही , पर ज़ुबा ने पढ़ा ही नहीं ,
वो क्या मिलता मुझे जो ना था कभी मेरा ,
मुझे मंज़िल का चला पता जब वक़्त गुजरा और गुजर गया सवेरा !
मेरे अंदर बसता था जो वो ज़ज्बा आज भी हैं ,
मेरी उम्मीदों को थामे मेरा ज़मीर थोड़ा नाराज़ भी हैं ,
हाथ थामे मेरा मुझसे कह रहा कोई ,
चल उठ दोबारा , तेरी कोशिश पर मुझे नाज़ भी है ,
पर वो क्या मिलता मुझे जो ना था कभी मेरा ,
मुझे मंज़िल का चला पता जब वक़्त गुजरा और गुजर गया सवेरा !
साथ मेरे कई और भी थे अपनी - अपनी नावों पर ,
मंज़िल का पता लिखें कहीं अपनी निगाहों पर ,
कास मेरी नज़रे भी पलकों का सहारा लेती ,
कस्ती मेरी चल परती दिल के दिखाए राहों पर ,
पर वो क्या मिलता मुझे जो ना था कभी मेरा ,
मुझे मंज़िल का चला पता जब वक़्त गुजरा और गुजर गया सवेरा !
जब आया भवर , तो हाँफती मेरी कस्ती चरमरायी थी ,
लहरों की चोट पर कभी रोयी तो कभी मुस्कराई थी ,
था अनोखा सा सफ़र जो आज भी जारी हैं ,
पतवार का सहारा ही सही पर कस्ती तो लरखड़ाई थी ,
पर वो क्या मिलता मुझे जो ना था कभी मेरा ,
मुझे मंज़िल का चला पता जब वक़्त गुजरा और गुजर गया सवेरा !
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- नेहा
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