शनिवार, 4 जुलाई 2015

अश्रु..

मेरे अन्तर्मन की व्यथा मुझमे ही घुली है..
मैं इस अवरूद्ध कंठ को ये कहने पे विवश कर रहा हुं..
मैं निष्काम अश्रु , नेत्रों का वरण करता हुँ..
परंतु बाधा ना बन सका , मैं निर्लज हुँ , जो बरबस बह रहा हुँ..

है यथा  तेरा भी , यथा मेरा  भी एक अश्तित्व सत्य का कह रहा हुँ ..
अनगिनत रहस्यों में धूमिल , कथित जीवन रहश्य का कह रहा हुँ ।

हैं नेत्रों के नल खोल के जो अमृत पान करता है..
मैं मरम सरिसा  संसार को स्वेक्षा से स्वीकार कर रहा हुँ..
मैं जल नहीं , जीवन नहीं , मैं अन्य ओछी नेत्रों से डरता हुँ..
मैं तेरी आत्मीयता के भय से , तेरी भौतिकता मैं विहार कर रहा हुँ..

है यथा  तेरा भी , यथा मेरा  भी एक अश्तित्व सत्य का कह रहा हुँ ..
अनगिनत रहस्यों में धूमिल , कथित जीवन रहश्य का कह रहा हुँ ।

मैं निर्भर तेरी भंगिमाओं पर , तू मुझे अकार देता है..
मोल मेरे छनभंगूर सृजन का , मैं आत्मसात कर रहा हुँ..
मैं तेरी महत्वकांछाओं की सुलगती भट्ठी से पिघला , बहता हुँ..
बेशब्द , तेरे भीतर के अवशाद को परख , एक बात कह रहा  हुँ..

है यथा  तेरा भी , यथा मेरा  भी एक अश्तित्व सत्य का कह रहा हुँ ..
अनगिनत रहस्यों में धूमिल , कथित जीवन रहश्य का कह रहा हुँ ।

मेरे उद्गम को जान कर अनजान करने वाला भी तू है..
मैं तेरी स्मृति के कोमल मुख पे , पुष्प सा झड़ रहा हुँ..
सुगमता का अदभूत अर्थ बन , कभी अधरों के संग महकता हुँ..
मेरी व्यापक्ता की परिभाषा नहीं , मैं तेरे साँचे में ढल रहा हुँ..

है यथा  तेरा भी , यथा मेरा  भी एक अश्तित्व सत्य का कह रहा हुँ ..
अनगिनत रहस्यों में धूमिल , कथित जीवन रहश्य का कह रहा हुँ ।
                                                                             
                                                                       


                                       -- स्नेहिऌ (28 June 2015)


शनिवार, 6 जून 2015

समंदर


नीला रंग था उसका , शोर भी जिसका हिस्सा था ,
वो समंदर सामने था मेरे , सुन रहा मेरा किस्सा था ।

मैंने कहा  , "पढ़ ले मुझे , मैं तेरी कहानी हुँ ",
किनारे ज़मीं पे जो बह रही , तेरा नमकीन पानी हुँ ।

मिट गया जो , छप रहा , सिने पे तेरे दरबदर ,
वो बहता पानी , संग मेरे , चल कर रहा था सफर ।

उसकी उफ़ान मुझको मेरी औकात याद दिला गई   ,
जो रहता था अंदर मेरे , मुझे उस तूफ़ान से मिला गई ।

मिठास संगीत की होती है क्या , उसका पता चला मुझे ,
उस सिरफ़िरे ने जो पिलाया , उससे भी प्यास क्यों बुझे ?

वो सूरज खड़ा इंतज़ार में , बाँहे थीं जिसकी खुली  ,
मिट गया उसके लिए , डूबी रौशनी , उसमे घुली ।

बदला समां , वो  रहा , रही उसकी फितरत वहीं ,
मैं खड़ी तकती रही , उसकी शराफत न बदली ।

एक टुकडा रेत का भी , ख़ामोश उसकी सुनता था ,
शायद कहीं  वो समंदर , सबकी दास्ताने बुनता था ।

मिल गया एक पल में जो , इक नया सपना था ,
उन लहरों में जो दिख गया , वो कोई मेरा अपना था ।

कह  अलविदा उसे , मैं मुड़ी एक दुसरी गली ,
तिनका चिराग़ का जला , क्या हुआ जो शाम ढली ।



                   --- स्नेहिऌ (27 March 2015 -Mangalore)

ये काफ़ी कितना होता है ?

क्या बारिश की बूंदे काफी हैं गागर को भरने के लिए ? क्या तिनके का सहारा काफी है सागर को तरने के लिए ? ये काफी कितना होता है! मन कचोट हृदय रोत...