सोमवार, 25 मई 2020

मेरे दिल~

जब भी झाँका ख़ुद के अंदर,
मेरा सच मुझसे कहता है,
तू कोशिशे लाख कर ले मेरे दिल ,
तेरे अंदर एक नासमझ ,नादान कोई रहता है |

हर किताबी सच पढ़ चूका वो,
कहानियाँ भी उसको मालूम थी कई सारी,
समझने लगा था खुद को घना पेड़ ,
पर रह गया बेचारा फूलों कि क्यारी |

कहता कैसे अपने सच को वो बेज़ुबान ,
मुठ्ठी में बंद किए उसको वो तड़पता रहा ,
पर न छुपा सका उससे हक़ीक़त अपनी ,
उस दिल का दिल था वो जो अंदर उसके धड़कता रहा|

पानी सा था रंग-रूप उसका भी ,
गहराईयाँ भी था - उसकी बेज़ुबान आँखों में ,
शायद वो दिल समझ जायेगा उस दिल को ,
जो था वक़्त बिताया मोहब्बत कि सलाखों में  |

साथ सांसे जो लेने लगे थे दोनों ,
उस दिल को अपने दिल की हरकतों का पता था ,
हाथ थामे चलें दोनों जब एक मंज़िल को पाने ,
रास्तों पे पसरा कोहरा कदम - कदम छटा था |

अनसुनी आवाज़ उसकी पहचान लेगा वो ,
कांपते होंठो से एक ज़िक्र भर काफी रहा ,
उस दिल की ख्वाहिशे भी बड़ी बचकानी रही ,
अपने दिल की अनकही फ़िक्र उसको नमाफी रहा |

आंखे मूंदे जब याद करते थे एकदूसरे को ,
मन के आईने में जो अक्स नज़र आते थे ,
उस दिल के अंदर का दिल ही तो है वो ,
ख़ुदी को खुदा से वो दिल अलग नहीं पाते थे |


                                                                                      
                                                                                                     

                                                                                                                                    -स्नेहिल

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

बोली धरती !

मैं धरती नवजीवित रहती - पर तेरा मोह सृजन का छूटा ना,
मिथ्या रुपी जाल था पसरा , अहंकारी दर्पण टूटा ना |

अनभिज्ञ रही अवसाद से अपने , मैं जीती सिसक सिसक ,
कुंठित रही संतान से अपने , मैं रोती बिलख बिलख |

निर्भर नहीं मैं किसी पर , तू पला जहा - वो तेरी जननी है ,
धिक्कारता स्वयं को , जो है काल पसरा , तेरी करनी है |

है विष्तृत वृक्ष वहीं , फैलाये आंचल , आसमान की छाँव में ,
जिसने बदला सम्पूर्ण जगत को , रुका अश्तित्व के पड़ाव में |

कलकल बहती नदियाँ आज भी सुरीले सरगम सुनाती है ,
बैरी बैठे सुनसान किनारे , गुनगुनाते अधीर कर्णो को  बुलाती है| 

कर्म चक्र की बेड़ी बांधे धर्मग्रंथों का तू अनुयायी ठहरा ,
क्यों सहम गया  परिणाम को देखे , ये और कुछ नहीं - बस तेरा चेहरा |

है बदल चूका युग , बदला मौसम , बदला विश्व मुखमण्डल है ,
मनुष्य भयावह रूप दिखाता , अब खुद से करता दंगल है |

क्यों सिमट गए सब घरों के अंदर , है खड़ा बुलंद आकाश वहीं ,
कैसा पोरस , कौन सिकंदर , जा कर नए घर की तलाश कहीं |

चट्टानों सा धैर्य लिए मेरे कपाल पर एक सत्य लिखा था ,
"तू शरणागत है इस प्रकृति का" क्या तेरे बंद चक्छुयो को दिखा था?

बोली धरती ! संताप की गगरी से निकला विष तो तुझे पीना पड़ेगा ,
समय रुपी झरने से जब तक न निकले अमृत तुझे जीना पड़ेगा |


                                                                                
                
                                                                                  - स्नेहिल

ये काफ़ी कितना होता है ?

क्या बारिश की बूंदे काफी हैं गागर को भरने के लिए ? क्या तिनके का सहारा काफी है सागर को तरने के लिए ? ये काफी कितना होता है! मन कचोट हृदय रोत...