बैठ अकेला सोच रहा था मैं क्यू इस संसार में ,
मैं संछिप्त क्योँ मैं सीमित क्योँ जीवन के बिस्तार में ,
मेरी आँखे ढूंढ रही थी छाव एक सुनहरी ,
मेरी बाँहे पूछ रही थी बढ़ोगे तुम कब प्रहरी ,
मैं गुमसुम सा बोल न पाया अपनी आशा टटोल ना पाया ,
मैं अकस्मित चटपटा रहा क्यों जीवन के मझदार में ,
बैठ अकेला सोच रहा था मैं क्यों इस संसार में ..
मैं पथिक थका अपने पथ पर माप रहा मंज़िल की दूरी ,
सुष्मित ,पुष्पित मार्ग नहीं ये , पर चलना है बहुत जरुरी ,
अतुल्य , अशंख्य श्रोत जहा मिलती है सागर की धारा ,
कोटि-कोटि के शंख वहाँ पिरोये मोतियों की माला,
अब कहता क्या , जो बोल न फूटे , भ्रम टुटा पर मोह न छूटे,
है हृदय भरा , अब भार ये कैसा ,मेरे जीर्ण उद्धार मैं
बैठ अकेला सोच रहा था मैं क्यों इस संसार में ..
है कठिन परन्तु सत्य यही ,कर कर्म तू अपना धर्म समझ ,
वो निःश्वाश समाया भीतर है ,ना प्राप्ताशा रख उसके एवज़ ,
है छल की लंका बाहर बसति , तू क्या स्वयं देख पायेगा ?
तुझ मैं जो है प्राणी बसा , सोने का लोभी बन जायेगा ,
बस अंतिम है सुन सत्य वचन , तू भूल व्यथा अब कर जतन ,
हुँ समझ चूका जो है रहश्य मैं , आत्मा के निराकार में ,
बैठ अकेला सोच रहा था मैं क्यों इस संसार में ..
जाने देना ही है जीवन ,इसका स्वरुप साश्वत है ,
इस चनचल मन की माया से, सम्पूर्ण जगत अभगत है,
मैं सरनागत विचलित चीत ठहरा ,
शोख करू किस बात पे ,
मैं सदा लूटा हुँ मान के अपना , अपनत्व के स्वार्थ में ,
मैं कपट करू या करू मैं करुणा यथा मेरे विचार में ,
बैठ अकेला सोच रहा था मैं क्यों इस संसार में ..
मैं चलता हुँ , जो दौड़ सका तो बात निराली होनी है
जो आज कलेश है ,कल प्रातः पुरानी होनी है ,
जो बीत गया वो छण , तेरे मर्म को पिघलायेगा ,
तू निखरा है हर डेग ,ये परिचय दे जायेगा ,
मैं पुनः चलना सीख रहा , छोड़ आश्रय सब ये चीख रहा ,
फिर मोह ये कैसा , कैसा प्रपंच ये ,मिला जिसे हरबार मैं ,
बैठ अकेला सोच रहा था मैं क्यों इस संसार में ..

-स्नेहिऌ
hume to moh liya apke akhshro k banawato ne hi...
जवाब देंहटाएंkaise likthi ho behna aisi kavitay batao to sahi...
TRULy AMAZINg !!
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जवाब देंहटाएंThank you..
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