रविवार, 19 अक्टूबर 2014

बैठ अकेला सोच रहा था ..!


बैठ अकेला सोच रहा था मैं क्यू इस संसार में  ,
मैं संछिप्त क्योँ मैं सीमित क्योँ  जीवन के बिस्तार  में  ,
मेरी आँखे ढूंढ रही थी छाव एक सुनहरी ,
मेरी बाँहे पूछ रही थी बढ़ोगे तुम कब प्रहरी ,
मैं गुमसुम सा बोल न पाया अपनी आशा टटोल ना पाया ,
मैं अकस्मित चटपटा रहा क्यों जीवन के  मझदार में ,

बैठ अकेला सोच रहा था मैं क्यों इस संसार में ..

मैं पथिक थका अपने पथ पर माप रहा मंज़िल की दूरी ,
सुष्मित ,पुष्पित मार्ग नहीं ये , पर चलना है बहुत जरुरी ,
अतुल्य  , अशंख्य श्रोत जहा मिलती है  सागर की धारा ,
कोटि-कोटि के शंख वहाँ  पिरोये मोतियों की माला,
अब कहता क्या , जो बोल न फूटे , भ्रम टुटा  पर मोह न छूटे,
है हृदय भरा , अब भार ये कैसा ,मेरे जीर्ण उद्धार मैं

बैठ अकेला सोच रहा था मैं क्यों इस संसार में ..

है कठिन परन्तु सत्य यही ,कर कर्म तू अपना धर्म समझ ,
वो निःश्वाश  समाया भीतर है ,ना प्राप्ताशा रख उसके एवज़ ,
है छल की लंका बाहर बसति , तू क्या स्वयं  देख पायेगा ?
तुझ मैं जो है प्राणी बसा , सोने  का लोभी बन जायेगा ,
बस अंतिम है सुन सत्य वचन , तू भूल व्यथा अब कर जतन ,
हुँ  समझ चूका जो है रहश्य मैं , आत्मा के निराकार में ,

बैठ अकेला सोच रहा था मैं क्यों इस संसार में ..

जाने देना ही है जीवन  ,इसका स्वरुप साश्वत है ,
इस चनचल मन की माया से, सम्पूर्ण जगत अभगत है,
मैं सरनागत  विचलित चीत ठहरा ,
शोख करू किस बात पे ,
मैं सदा लूटा हुँ मान के अपना , अपनत्व के स्वार्थ में ,
मैं कपट करू या करू मैं करुणा यथा मेरे विचार में  ,

बैठ अकेला सोच रहा था मैं क्यों इस संसार में ..


मैं चलता हुँ , जो दौड़  सका तो बात निराली होनी है
जो आज कलेश है ,कल प्रातः पुरानी होनी है ,
जो बीत गया वो छण , तेरे मर्म को पिघलायेगा ,
तू निखरा है हर डेग ,ये परिचय दे जायेगा ,
मैं पुनः चलना सीख रहा , छोड़ आश्रय सब ये चीख रहा ,
फिर मोह ये कैसा , कैसा प्रपंच ये ,मिला जिसे हरबार मैं ,

बैठ अकेला सोच रहा था मैं क्यों इस संसार में ..





                                                                                                  -स्नेहिऌ

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