रविवार, 16 सितंबर 2018

क्यों।

क्यों कल की फिकर सताए है, जो आज कहा सब पाए है।
क्यों मोह का बंधन टूटा है , सब ओर जो पसरा झूठा है।

क्यों सांझ पंछी घर को जाए है, किरणे जो राह दिखाए है।
क्यों तू मुस्काता हर पीड़ में भी, जो पीर को पाता हर भीड़ में भी।   
                                                                  
क्यों दुख़ के बादल गरज रहे, जो बाद में पुष्पित बरस रहे।
क्यों पोधा बाहर आकर भी, सब समझ गया ना चाह कर भी।

क्यों नदियां कल कल बहती है,जो दरिया में जाकर मिलती है।
क्यों शोर मचाता दौड़ रहा , वो मौन सन्नाटा बोल रहा।

क्यों हमसे हाथ मिलाए है, जो गैरो की बारात में आए है।
क्यों सदियां सौगातें लायी है , जो हमसे मिलने आयी है। 

क्यों होता मन्न में हौसला , जब बात अपनों की आती है।
क्यों कांटो पे भी सो लेते है, जब बात सपनों की आती है।

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

रास्ता |

मैं अकेला ही चलूंगा , मिल जाएगी मंज़िल मुझे
रास्तों के पत्थरों से टूटना नहीं मुझे 
हर कदम पे एक कदम हो हौसला हासिल मुझे 
धुँधले उम्मीदों की कमान से छुटना नहीं मुझे || 

पैदल चलूँगा कंकरो पे धुप भी सहूँगा मैं ,
वो रास्ता लम्बा सही उसपर चलता रहूँगा मैं 
सकले बनाती दुनिया मुझे डरा रही हर घड़ी 
तू आज़मा ले मेरी हिम्मत ये सदा कहूँगा मैं || 


ये काफ़ी कितना होता है ?

क्या बारिश की बूंदे काफी हैं गागर को भरने के लिए ? क्या तिनके का सहारा काफी है सागर को तरने के लिए ? ये काफी कितना होता है! मन कचोट हृदय रोत...